हजारों कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों पर है, हमला: सीटू

शिमला/विवेकानंद वशिष्ठ :-   सीटू राज्य कमेटी हिमाचल प्रदेश ने हिमाचल प्रदेश सरकार की 6 सितंबर 2025 की अधिसूचना को कर्मचारी विरोधी करार दिया है। यह हजारों कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों पर हमला है।

 

यह संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत समानता के अधिकार व अनुच्छेद 21 में प्राप्त जीने के अधिकार का भी सीधा उल्लंघन है। सीटू ने मांग की है कि इस अधिसूचना को तुरंत निरस्त किया जाए व प्रदेश की 89 श्रेणियों के हजारों कर्मचारियों के आर्थिक लाभों को 6 सितंबर 2022 के जनरल पे रिवीजन के नियम 7A की अधिसूचना जोकि 3 जनवरी 2022 से पहले नियमित हुए कर्मचारियों के लिए लागू हुई थी व बाद में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय जिसमें 3 जनवरी 2022 के बाद नियमित हुए कर्मचारियों को भी इसमें जोड़ा गया की तर्ज पर पूर्ववत बहाल किया जाए।

सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा व महासचिव प्रेम गौतम ने कहा है कि सरकार के इस निर्णय से हजारों कर्मचारी प्रभावित होंगे व आर्थिक लाभों से वंचित होंगे। इस निर्णय से कर्मचारियों को दस से पंद्रह हजार रुपए का आर्थिक नुकसान होगा।

 

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत व भारत वर्ष के अनेकों न्यायालयों के निर्णयों में यह भलीभांति सिद्ध हो चुका है कि किसी भी कर्मचारी को मिल रहे आर्थिक लाभों में कटौती नहीं की जा सकती है व यह न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।

 

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय भी प्रदेश सरकार को आदेश दे चुका है कि सभी कर्मचारियों को समान रूप से वेतन व आर्थिक लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है। सरकार का यह निर्णय न केवल कर्मचारी विरोधी है अपितु न्यायालय के आदेशों की भी अवहेलना है।

 

उन्होंने कहा है कि संविदा श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) विधेयक 1970 स्पष्ट करता है कि निरंतर स्थाई बारहमासी किस्म के कार्य पर कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर कर्मचारियों से कार्य करवाना कानून विरुद्ध है।

 

सबसे पहले प्रदेश सरकार ने निरंतर स्थाई बारहमासी किस्म के कार्य पर नियमित कर्मचारियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट नियुक्तियां करके देश के कानून का उल्लंघन किया व अब सरकार उन कर्मचारियों के न्यायसंगत आर्थिक अधिकारों पर कुठाराघात कर रही है।

मोदी सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां को लागू करने वाली प्रदेश सरकार के इस निर्णय से स्पष्ट है कि यह सरकार अपने चहेतों, बड़े अधिकारियों, पुनर्नियुक्ति अधिकारियों, बोर्डों निगमों के नामित निदेशकों एवं सदस्यों के लिए खुला खजाना लुटा रही है परंतु कर्मचारियों, मजदूरों, किसानों, आम जनता को आर्थिक सुविधाएं देने के नाम पर आर्थिक संकट का रोना रो रही है। यह प्रदेश सरकार का दोहरापन है।

 

यह सरकार कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए न्यायालयों के आदेशों को ठेंगा दिखा रही है व उनकी अवमानना कर रही है। सरकार की कर्मचारी विरोधी नीतियां सरकार की पोल खोल रही हैं। यह सरकार ओपीएस देने की आड़ में कर्मचारियों के बकाया एरियर, महंगाई भत्ते व अन्य भत्तों, देय आर्थिक लाभों पर कैंची चला रही है।

 

हिमाचल प्रदेश के डेढ़ लाख कर्मचारियों ने अपने निर्णायक संघर्ष से ओपीएस हासिल की है। यह कोई वर्तमान सरकार की मेहरबानी से नहीं हुआ है। इसलिए सरकार ओपीएस का श्रेय लेना बंद करे व इसकी आड़ में लाखों कर्मचारियों के देय आर्थिक लाभों पर डाका डालना बंद करे।

 

अगर सरकार ओपीएस पर इतनी ही गंभीर है तो फिर निगमों व बोर्डों के कर्मचारियों के लिए ओपीएस क्यों लागू नहीं करती है। उन्होंने प्रदेश की सभी कर्मचारी यूनियनों से अपील की है कि वे मोदी सरकार की नक़ल करने वाली प्रदेश सरकार की नवउदारवादी कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ लामबंद हों।