



हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ :- पूर्व केंद्रीय मंत्री व हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने आज लोकसभा में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि वंदे मातरम् से राष्ट्रभक्तों के लिए एनर्जी मिलती है जबकि राष्ट्रविरोधियों के लिए यह एलर्जी है और वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं बल्कि राष्ट्रप्रेम की रीत है और कांग्रेस इसी से भयभीत है।
पहले अंग्रेज़ों को, जिन्ना को और अब जिन्ना के मुन्ना को वंदे मातरम् से दिक्कत: अनुराग सिंह ठाकुर



अनुराग ठाकुर ने कहा “वंदे मातरम् कोई धार्मिक गीत नहीं, किसी व्यक्ति या दल या राज्य का गीत नहीं, वंदे मातरम् राष्ट्र की आत्मा का गीत है, भारत के गौरव का गीत है, हर भारतीय के आशाओं-आकांक्षाओं का सुरमयी गीत है।



वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं बल्कि राष्ट्रप्रेम की रीत है और कांग्रेस इसी से भयभीत है: अनुराग सिंह ठाकुर

वंदे मातरम से जो हिस्से कांग्रेस ने, जवाहरलाल नेहरू के कहने पर हटाए, उन हिस्सों के बड़े किस्से हैं। उन हिस्सों में मां दुर्गा की स्तुति थी.. शक्ति की आराधना थी, उन हिस्सों को हटाना भारत की आत्मा को चीरना था। कांग्रेस एंड कंपनी ने वंदे मातरम् के विरुद्ध एक महापाप किया है।

पंडित नेहरू ने वंदे मातरम को काट दिया, देश को बांट दिया: अनुराग सिंह ठाकुर

आज जबकी उस महामंत्र के रचना का एक सौ पचासवां साल मनाया जा रहा है कांग्रेस चाहे तो उस महापाप का प्रायश्चित कर सकती है।
लेकिन रेडिकल कम्युनिज्म और लीगी मानसिकता से घिरे कांग्रेस नेतृत्व से इस तरह के सद्बुद्धि की उम्मीद करना बेकार है।
जितनी लाठियाँ चलीं, उससे दुगनी आवाज़ ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष से हुई: अनुराग सिंह ठाकुर

अनुराग ठाकुर ने आगे कहा कि जिन्ना और लीगी मानसिकता को खुश करने के लिए नेहरूजी ने बंदे मातरम को काट छांट कर छोटा कर दिया। 1947 में उसी जिन्ना को खुश करने के लिए इन्होंने भारत के दो टुकड़े भी कर दिए।
आजादी के 78 साल बाद भी कांग्रेस पार्टी जिन्ना के मुन्ना को खुश रखने के लिए वंदे मातरम् पर गन्दी राजनीति कर रही है। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ इच्छा और अनिच्छा का विषय नहीं हो सकता। क्या सच में मातृभूमि के सामने सर झुकाने से भारत माता को नमन करने से किसी के धार्मिक भावना आहत हो जाती है?
अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा “कांग्रेस और दूसरी पार्टियों में एक कॉम्पिटिशन चल रहा है की कौन सबसे अधिक वंदे मातरम का विरोध करता है। यह कौन सी मानसिकता है कि जिस शब्द ने, जिस कविता ने राष्ट्रवाद का ज्वार पैदा किया, हमें अंग्रेज़ों से लड़ने का हौसला दिया हो उससे चंद लोगों को दिक्कतें हो रही है।
जिस वंदे मातरम् पर हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए अपने जान न्योछावर किए उससे दिक्कत, जिस वंदे मातरम का धुन विश्वकवि रविंद्रनाथ टैगोर ने बनाया था उससे दिक्कत, जिस वंदे मातरम को लता दीदी ने अपनी आवाज दी उससे दिक्कत, जो वंदे मातरम चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, मदनलाल धींगरा, वीर सावरकर, राम प्रसाद विस्मिल जैसे क्रांतिकारियों का अभिवादन था उससे दिक्कत।
जिस वंदे मातरम का नारा लगाने की वजह से हेडगेवार जी को स्कूल से निकाल दिया गया उससे दिक्कत, जिस वंदे मातरम के समर्थन में लेख छापने के कारण लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को देश निकाला मिला उससे दिक्कत, जिस वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है उससे भी दिक्कत आखिर क्यों?”
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् की प्रशंसा भगत सिंह, अशफाकउल्लाह खान, राजगुरु, सुखदेव, खुदी राम बोस, राम प्रसाद बिस्मिल आदि सभी महान क्रांतिकारियों ने की थी। वंदे मातरम् को भारत के हर राज्यों की विभूतियों का प्यार मिला। तमिलनाडु से राष्ट्रवादी कवि सुब्रमण्यम भारती में 1905 व 1908 में तमिल में अनुवाद किया।
रविंद्र नाथ टैगोर जी ने 1896 में वंदे मातरम् गाया तो अबनिन्द्र नाथ टैगोर जी ने भारत माता की पेंटिंग को बनाया। सुप्रसिद्ध गायक मास्टर कृष्णराव ने इसके लिए कड़ा संघर्ष किया। इस तर्क के तहत कि “अगर रेडियो पर ‘वंदे मातरम’ नहीं है, तो मेरा कोई गीत नहीं है”, उन्होंने कई वर्षों तक ऑल इंडिया रेडियो पर प्रस्तुति नहीं दी।
अनेकों राष्ट्रकवि हों, राष्ट्रवादी फ़िल्में हों मशहूर गायक जैसे लता मंगेशकर जी हों, एआर रहमान जी हों, हेमंत कुमार जी हों सबने वंदे मातरम् को पूरा सम्मान दिया मगर सिर्फ़ वोटबैंक की राजनीति के चककर में कांग्रेस सदा इसका तिरस्कार करती रही।
1896 में कलकत्ता में कांग्रेस के 12वें अधिवेशन में ये गीत गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने गाया था। उस अधिवेशन की अध्यक्षता एक मुस्लिम कर रहे थे रहीमतुल्ला एम सयानी ने की थी, तब ये गीत मुस्लिम विरोधी नहीं था।
1905 में बंगाल के बारीसाल में चितरंजन गुहा ठाकुरता ने वंदे मात्रम के लिए अपना ख़ून बहाया:,1907 में वंदे मातरम् गाने वाले सुशील चन्द्रसेन को कोड़ों से मारने की सजा दी गई। 1908 में खुदीराम बोस वंदे मातरम् बोलकर फाँसी चढ़ गए। 1909 में मदनलाल ढींगरा वंदे मातरम् बोल लंदन में फाँसी पर झूल गए।
1927 में राम प्रसाद बिसम्मिल वंदे मातरम् बोलकर फाँसी चढ़ गए। 1931 में कलकत्ता में जब दिनेश चंद्र गुप्ता वंदे मातरम् का उद्घोष किया तो पूरी जेल में हर सलाखें हिलाते हुए सैंकड़ों क़ैदियों ने वंदेमातरम के गगनभेदी उद्घोष से अंग्रेज़ों की रूह कंपा दी। “वंदे मातरम” आज भी एकजुटता और देशभक्ति का एक प्रिय गीत है, भले ही “जन गण मन” को राष्ट्रगान के रूप में चुना गया हो और हर भारतीय हमारे राष्ट्रगान का समान रूप से सम्मान करता है।















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