



शिमला:- हिमाचल प्रदेश के माननीय और यशस्वी मुख्यमंत्री महोदय ने राजस्व घाटा अनुदान बंद होने के बाद की स्थितियों पर चर्चा के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है। यह सत्र एक दिन का होगा या दो दिन का अभी यह तय नहीं है।
लेकिन यह तय है के यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिसपर सदन में मंथन होना जरूरी है। हालाँकि ऐसा सदन के बाहर भी हो सकता है बशर्ते सभी दल (अगर कोई तीसरा भी है तो ) इसपर तैयार हों तो। ऐसा तो है ही नहीं के सुक्खू सरकार के कुछ कार्यों की वजह से यह अनुदान बंद हुआ हो, जैसा की बीजेपी जतला रही है ।


इसमें पूर्व सरकारों का भी पूरा योगदान है। पिछले 15 बजट अगर बिना किसी नए कर के (करमुक्त ) थे तो वह भी एक कारण है। केंद्र सरकार और वित् आयोग कई साल से इस बाबत चेतावनियां दे रहा था के आपको अपने फज़ूल के खर्च रोकने होंगे ताकि आपकी केंद्रीय सहायता में कमी न आये।



लेकिन किसी भी सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। सिर्फ वीरभद्र सिंह ने केंद्र की ऐसी ही नीतियों के पहले ही डोजियर पर पुरानी पेंशन बंद कर दी थी। लेकिन वर्तमान सरकार ने वह भी बहाल कर दी। लेकिन यह अकेला कारण भी नहीं। इस बीच और भी कई ऐसे काम हुए जिन्हें आप गैर जरुरी खर्चों में शामिल कर सकते हैं। लम्बी फेरहिस्त है।
खैर अब जब यह विशेष सत्र इसे ही डिस्कस करने को बुलाया जा रहा है तो बेहतर होगा के पहले सरकार कुछ ऐसे कदम भी उठाये जो उसकी संजीदगी दर्शाते हों के वह अब झटका लगने के बाद ही सही लेकिन फजूलखर्ची रोकने को तैयार है।

इस दिशा में पहल उन सेवानिवृत चीफ सेक्रेटरियों और बड़े साहबों को हटाकर की जा सकती है जिनकी नियुक्तियां सबको खली थीं । जब सरकार सेवानिवृत अफसरों को फिर से मोटे पैसे देकर रिअंगेज़ करेगी और काम के नाम पर उनके पास गोल्फ ही होगा तो फिर नोटिस तो होगा ही।
कैबिनेट रैंक वाले सभी एक रूपये वेतन लेने वाले क्यों नहीं हो सकते .?? बसों में कामकाजी महिलाएं जब सरकारी वेतन के साथ रियायती सफर का आनंद लेंगी तो राजस्व हानि तो होगी ही।
एक सज्जन को तीन महीने के भीतर ही जब एक लाख की वेतन बढ़ोतरी मिलेगी तो लोग कैसे चुप रहेंगे। जिन गाड़ियों को बड़े बड़े धन्ना सेठ 7 -8 लाख किलोमीटर चलाकर भी बदलने की नहीं सोचते (क्योंकि जरूरत ही नहीं पड़ती ) उनके अढ़ाई लाख किलोमीटर होने पर जब नए वाहन खरीदे जायेंगे तो फजूलखर्ची क्यों नहीं होगी।
ये महज उदाहरण है। सारा कुछ लिखने बैठेंगे तो पूरा पढ़ते पढ़ते ही विशेष सत्र शुरू हो जायेगा। फिर चाहे वे सरकारी खर्चे से होली की पार्टियां हों या लाखों रुपये सरकारी खजाने से देकर खरीदी गयी दिवाली के तोहफेवाली सेब की पेटियां ।
















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