“ठाकुर साहब, पहले खाना खाओ” 

हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ:- हमीरपुर की फिज़ा में इन दिनों एक अलग-सा बदलाव महसूस किया जा रहा है। यह बदलाव किसी नई सरकारी योजना या बड़ी प्रशासनिक घोषणा का नहीं, बल्कि एक मानवीय स्पर्श का है। और इस मानवीयता के केंद्र में हैं हमीरपुर के उपायुक्त (DC) पद पर आसीन आईएएस अधिकारी अमरजीत सिंह।

 

करीब डेढ़ वर्ष पहले जब अमरजीत सिंह ने हमीरपुर में कार्यभार संभाला था, तब कई लोगों के मन में सवाल थे। सचिवालय में वर्षों का अनुभव रखने वाले इस अधिकारी को मुख्यमंत्री ने ज़िले की इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों सौंपी? लेकिन आज वही हमीरपुर, मुख्यमंत्री के इस फैसले पर गर्व करता है।

DC अमरजीत सिंह किसी किस्से-कहानियों के पात्र नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत में उतर चुकी संवेदनशीलता का नाम बन चुके हैं। उनका कार्यालय आम आदमी के लिए हमेशा खुला रहता है—ना किसी “चिट” की ज़रूरत, ना अपॉइंटमेंट की बाध्यता। बैठकों की व्यस्तता के बीच भी लोगों की समस्याएँ सुनना उनकी प्राथमिकता रहती है।

ऐसी ही एक दोपहर उनके कार्यालय में एक दृश्य सामने आया, जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

एक बूढ़ा, कमज़ोर-सा व्यक्ति कमरे में दाख़िल हुआ। चेहरे पर उम्र और संघर्ष की गहरी लकीरें थीं। उसका नाम शायद किसी फ़ाइल में दर्ज नहीं था, लेकिन DC साहब ने उसे “ठाकुर” कहकर संबोधित किया। उसकी उँगली थामे उसका नन्हा-सा पोता खड़ा था—बोलने में असमर्थ। माता-पिता इस दुनिया में नहीं थे और अब उस बच्चे की पूरी ज़िम्मेदारी उसी बूढ़े कंधे पर थी।

ठाकुर के हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी दरख़्वास्त थी—शायद आख़िरी उम्मीद।

जब अमरजीत सिंह ने वह काग़ज़ हाथ में लिया, तो उनकी नज़र शब्दों पर नहीं, सामने खड़े भूखे और थके हुए दादा-पोते पर टिक गई। एक अनुभवी अधिकारी का नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान का दिल बोल उठा।

उन्होंने करुणा भरे स्वर में कहा—

“ठाकुर साहब, पहले खाना खाओ। काम तो हो ही जाएगा। अर्ज़ियाँ आती-जाती रहती हैं, पहले खाना ज़रूरी है।”

उन्होंने तुरंत चपरासी को बुलाया और निर्देश दिया—

“इन दोनों को ले जाओ, भरपेट खाना खिलाओ। खाना खा लें, फिर वापस ले आना।”

ठाकुर को यक़ीन नहीं हुआ। हकलाते हुए बोला,

“साहब… मेरा काम…”

DC साहब ने सादगी लेकिन दृढ़ता से कहा—

“ठाकुर साहब, पहले खाना खाओ। आपका काम हो जाएगा।”

उस पल ठाकुर को लगा मानो वह किसी सरकारी दफ़्तर में नहीं, बल्कि किसी मंदिर के प्रांगण में खड़ा हो। सामने कोई अधिकारी नहीं, बल्कि ऐसा मसीहा था जिसने उसकी भूख को उसकी अर्ज़ी से पहले पढ़ लिया। उसकी आँखें भर आईं और वह नतमस्तक होकर भोजन के लिए चला गया।

यह घटना बताती है कि अमरजीत सिंह हमीरपुर के लिए सिर्फ़ एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा क्यों हैं। उन्होंने साबित किया कि प्रशासनिक दक्षता और मानवीय संवेदनशीलता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

क्योंकि एक सच्चे अधिकारी की पहचान सिर्फ़ नियम-क़ानूनों से नहीं, बल्कि करुणा से होती है—

और यही करुणा थी जिसने “काम” से पहले

“ठाकुर साहब को खाना खाने” को कहा।