नक्शे खींचने से नहीं, खजाना भरने से विजन बनता है: राजेंद्र राणा

हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ:-  प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक राजेंद्र राणा ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा नए जिले बनाने के लिए आयोग गठित करने को चुनावी शगूफा करार दिया है। जारी प्रेस विज्ञप्ति में राजेंद्र राणा ने कहा कि दो-अढ़ाई दशक से नए जिले बनाने की मांग उठती रही है, लेकिन हर सरकार ने वित्तीय स्थिति देखते हुए हाथ खींच लिए हैं।

नए जिलों की बातें महज शगूफा, 10 गारंटियों के झूठ और सरकार के फेलियर से ध्यान बंटाने का ड्रामा

2002 में प्रेम कुमार धूमल सरकार ने इसका खाका बनाया, 2011 में फिर चर्चा हुई, पर वित्तीय बोझ देखकर स्थगित कर दिया। 2013 में वीरभद्र सिंह सरकार ने भी आयोग की बात कही, पर बाद में खुद ही कहा कि यह प्राथमिकता नहीं है और खजाने पर बोझ पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों ने सारी वित्तीय स्थिति का आकलन कर प्रदेश हित में फैसला टाल दिया। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी सुक्खू सरकार ने असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए मुद्दा उछाला है, जबकि पिछले शीतकालीन सत्र में मुख्यमंत्री ने सदन में खुद कहा था कि नए जिलों का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। फिर मई, 2026 में कैबिनेट से मंजूरी और अब अक्तूबर माह में आयोग भी गठित कर दिया, वो भी चुनाव से चंद महीने पहले। इससे साफ है कि यह प्रशासनिक सुधार नहीं, ध्यान भटकाने की राजनीति है।

राणा ने कहा कि भाजपा नए जिलों के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। हिमाचल जैसे कठिन भूगोल वाले राज्य में प्रशासनिक विकेंद्रीकरण होना चाहिए और भाजपा न तो इसका विरोध कर रही है और न ही कोई आपत्ति है, लेकिन सवाल नियत और समय का है। वर्तमान में प्रदेश 1 लाख 15 हजार करोड़ के ऐतिहासिक कर्ज के बोझ तले दबा है। इस सरकार ने ही पौने चार साल में 46 हजार करोड़ से अधिक कर्ज ले लिया है। त्योहारी सीजन सिर पर है लेकिन कर्मचारियों का जीपीएफ रोकने के साथ डीए, एरियर और तमाम देनदारियां लटकी हैं। हिमकेयर, सहारा जैसी जीवन रक्षक योजनाएं बंद पड़ी हैं। बुजुर्ग पेंशन के लिए दौड़-धूप कर रहे हैं और बेरोजगार नौकरी के लिए। महिलाओं के 1500 रुपए देने से सरकार भाषणों में ही आगे है और विकास कार्य ठप हैं। सड़कों की हालत किसी से छिपी नहीं है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया है। मुख्यमंत्री सुक्खू ऐसे पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने अपने पद और कुर्सी की गरिमा तक का ख्याल नहीं रखा। जब 10 गारंटियों का झूठ बेनकाब हो गया और सरकार के फेलियर पर जनता में गुस्सा और निराशा है, तो विदाई के चंद माह बचे देखकर अब नए जिलों का शगूफा छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि विजन का अर्थ नए नक्शे खींचना नहीं, खजाना भरकर नक्शे को ताकत देना होता है। राणा ने मांग की कि मुख्यमंत्री इस पर श्वेत पत्र जारी करें और स्पष्ट करें कि इन नए जिलों के गठन पर कितना बजट खर्च होगा और उसकी भरपाई कहां से करेंगे? जब सरकार ने अपनी 10 गारंटियां पूरी नहीं की, कर्मचारियों की देनदारियां जारी नहीं कर रहे और आर्थिक सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ रही है , तो नए जिले बनाने का ड्रामा ही क्यों किया जा रहा है? उन्होंने कहा कि सच्चाई यही है कि मुख्यमंत्री को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करना ही मुख्य एजेंडा है तथा प्रदेश या जन हितैषी नीतियों से कोई सरोकार नहीं है।

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