एचपीयू में बेतहाशा फीस वृद्धि के खिलाफ एसएफआई का उग्र प्रदर्शन, छात्र विरोधी फैसले वापस लेने की मांग

शिमला/विवेकानंद वशिष्ठ :-  (एसएफआई), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा हाल ही में की गई फीस वृद्धि के खिलाफ विश्वविद्यालय परिसर में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया गया।

प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों एवं विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों ने भाग लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की और फीस वृद्धि के निर्णय को तुरंत वापस लेने की मांग उठाई।

एसएफआई ने इस फीस वृद्धि को शिक्षा के अधिकार पर हमला बताते हुए कहा कि यह फैसला गरीब, ग्रामीण, अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय छात्रों को उच्च शिक्षा से बाहर करने का प्रयास है।

एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा परीक्षा शुल्क (Examination Fee), छात्रावास शुल्क (Hostel Fee), पुनर्मूल्यांकन शुल्क (Re-evaluation Fee), मरम्मत शुल्क (Repair Charges) तथा अन्य कई शुल्कों में भारी बढ़ोतरी की गई है, जिससे पहले से आर्थिक संकट झेल रहे विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।

 

संगठन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में, जहां अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण और किसान-मजदूर परिवारों से आते हैं, वहां इस प्रकार की बेतहाशा फीस वृद्धि छात्रों के लिए उच्च शिक्षा को लगभग असंभव बना देगी। विश्वविद्यालय का दायित्व छात्रों को सस्ती और सुलभ शिक्षा प्रदान करना है, न कि शिक्षा को एक व्यापारिक मॉडल में बदल देना।

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए एसएफआई सचिव कामरेड मुकेश ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी प्रशासनिक विफलताओं, वित्तीय कुप्रबंधन और गलत नीतियों का बोझ छात्रों पर डालने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि विश्वविद्यालय आर्थिक संकट की बात करता है, तो उसे पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि वर्षों से विश्वविद्यालय के संसाधनों और फंड का उपयोग किस प्रकार किया गया।

 

विश्वविद्यालय के पास उपलब्ध संसाधनों के उचित प्रबंधन, दीर्घकालिक वित्तीय योजना और जवाबदेही की गंभीर कमी रही है, जिसका खामियाजा अब छात्रों से वसूला जा रहा है।

एसएफआई सचिव ने आगे कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार यह तर्क देता है कि वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण फीस बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन यह तर्क तब खोखला साबित हो जाता है जब विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों के आरोप सामने आते हैं। संगठन ने कहा कि हालिया Comptroller and Auditor General of India (कैग) रिपोर्ट में लगभग **186 शिक्षकों की नियुक्तियों और पदोन्नतियों में अनियमितताओं** की ओर संकेत किया गया है। यदि विश्वविद्यालय में इतने बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी जिम्मेदारी तय करने के बजाय प्रशासन छात्रों पर फीस का बोझ डालने की कोशिश क्यों कर रहा है? आखिर विश्वविद्यालय प्रशासन की गलतियों और कथित भ्रष्टाचार की कीमत छात्र क्यों चुकाएं?

एसएफआई ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में बिना किसी ठोस योजना के खर्च किए गए संसाधनों, प्रशासनिक अव्यवस्था और वित्तीय कुप्रबंधन के कारण उत्पन्न संकट को अब छात्रों से पैसे वसूलकर हल करने की कोशिश की जा रही है। संगठन ने कहा कि यह न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि शिक्षा के लोकतांत्रिक चरित्र के भी खिलाफ है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन वास्तव में आर्थिक संकट को दूर करना चाहता है, तो उसे पहले अनावश्यक खर्चों पर रोक लगानी चाहिए, जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए तथा राज्य सरकार और संबंधित संस्थाओं से वित्तीय सहायता के लिए प्रयास करना चाहिए।

एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय में लगातार फीस बढ़ोतरी की प्रवृत्ति चिंताजनक है। पहले भी विभिन्न मदों में शुल्क बढ़ाए गए हैं और अब एक बार फिर छात्रावास शुल्क, परीक्षा शुल्क, पुनर्मूल्यांकन शुल्क तथा मरम्मत शुल्क में वृद्धि ने छात्रों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। विशेष रूप से शोधार्थियों और दूरदराज़ क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए यह निर्णय बेहद नुकसानदायक सिद्ध होगा। ऐसे समय में जब बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है, विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कदम पूरी तरह असंवेदनशील और छात्र-विरोधी है।

संगठन ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों से संवाद स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा है। फीस वृद्धि जैसा महत्वपूर्ण फैसला छात्रों, छात्र संगठनों और संबंधित पक्षों से चर्चा किए बिना लागू करना अलोकतांत्रिक रवैये को दर्शाता है। एसएफआई का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक विश्वविद्यालय का उद्देश्य शिक्षा को अधिक सुलभ बनाना होना चाहिए, न कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए नई बाधाएं खड़ी करना।

एसएफआई ने स्पष्ट शब्दों में मांग की कि विश्वविद्यालय प्रशासन हालिया फीस वृद्धि को तत्काल प्रभाव से वापस ले। संगठन ने परीक्षा शुल्क, छात्रावास शुल्क, पुनर्मूल्यांकन शुल्क, मरम्मत शुल्क और अन्य सभी बढ़ाए गए शुल्कों को रद्द करने की मांग की है। साथ ही विश्वविद्यालय के वित्तीय प्रबंधन, कथित अनियमितताओं और कैग रिपोर्ट में उठाए गए सवालों की उच्चस्तरीय, समयबद्ध और निष्पक्ष जांच करवाने की भी मांग की गई।

प्रदर्शन के अंत में एसएफआई ने चेतावनी दी कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्द इस छात्र-विरोधी फैसले को वापस नहीं लिया, तो संगठन विश्वविद्यालय स्तर से लेकर राज्यव्यापी आंदोलन खड़ा करेगा। एसएफआई ने कहा कि शिक्षा पर हमला किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष को और तेज किया जाएगा।

[post-views]