डॉक्टर भगवान नहीं, इंसान हैं: डाॅ. पुष्पेंद्र वर्मा

हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ:-  देशभर के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों मरीज उपचार के लिए आते हैं। डॉक्टर दिन-रात, बिना किसी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति का भेदभाव किए हर मरीज को बचाने का पूरा प्रयास करते हैं।

 

अधिकांश मरीज स्वस्थ होकर अपने घर लौटते हैं, लेकिन यदि गंभीर परिस्थितियों में किसी एक मरीज को भी बचाया नहीं जा सके, तो सबसे पहले डॉक्टर की नीयत और कार्यशैली पर सवाल उठने लगते हैं।

अक्सर अस्पताल की व्यवस्थागत कमियों का दोष भी डॉक्टरों पर ही मढ़ दिया जाता है। भवन जर्जर हो, मशीनें खराब हों, दवाइयों की कमी हो, स्टाफ का अभाव हो या अन्य प्रशासनिक समस्याएँ हों—हर स्थिति में सबसे पहले डॉक्टर ही कठघरे में खड़ा दिखाई देता है।

 

जबकि इन व्यवस्थाओं का संचालन और संसाधनों की उपलब्धता कई अन्य संस्थागत स्तरों पर निर्भर करती है। लेकिन इन कमियों को दूर करने का जमा हमारे जन्म प्रतिनिधियों और लेकिन जब भी कोई दुर्घटना होती है तो यही राजनेता और जनप्रतिनिधि आप लोगों की मासूमियत का फायदा उठाकर डॉक्टर को शैतान घोषित कर अपने वोटो की राजनीति के चक्कर में और ब्यूरोक्रेट्स अपनी निष्पक्षता दिखाने के लिए तुरंत डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों पर कार्रवाई करते हैं जबकि उनके द्वारा पैदा की गई कमियों के बारे में कोई बात नहीं करता।

यह भी सत्य है कि चिकित्सा सेवा अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। डॉक्टर लगातार लंबे समय तक कार्य करते हैं, मानसिक दबाव झेलते हैं और कई बार अपने परिवार से दूर रहकर भी मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। वे भी इंसान हैं—उनकी भी सीमाएँ हैं, भावनाएँ हैं और परिवार है।

 

मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस को लापरवाही समझना भी एक त्रुटि होगी क्योंकि वैज्ञानिक तौर पर चिकित्सा की किताबों में इन मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस का जिक्र उपलब्ध है जिनकी वजह से कई बार डॉक्टर अपने मरीज को मौत के मुंह में जाता हुआ सिर्फ देख सकते हैं।

 

निस्संदेह, यदि कहीं चिकित्सकीय लापरवाही होती है तो उसकी निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए तथा दोषी के विरुद्ध उचित कार्रवाई भी होनी चाहिए।

 

लेकिन कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे चिकित्सा समुदाय को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। इससे ईमानदारी से सेवा कर रहे हजारों डॉक्टरों का मनोबल प्रभावित होता है।

 

दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कई बार अस्पतालों में तोड़फोड़, डॉक्टरों के साथ अभद्रता और हिंसा जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं हो सकता। डॉक्टर और मरीज का रिश्ता विश्वास, संवेदना और सहयोग पर आधारित होना चाहिए।

 

कमोबेश पूरे भारतवर्ष में सरकारी अस्पताल सीमित संसाधनों के बावजूद करोड़ों लोगों के लिए आशा का सबसे बड़ा केंद्र हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य सेवाओं को राजनीतिक विवादों से दूर रखते हुए अस्पतालों का बुनियादी ढाँचा मजबूत किया जाए, पर्याप्त दवाइयाँ, आधुनिक उपकरण, विशेषज्ञ चिकित्सक और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराया जाए। विशेष रूप से प्रत्येक जिला अस्पताल में आधुनिक क्रिटिकल केयर, ट्रॉमा और आपातकालीन सुविधाओं को सुदृढ़ करना समय की आवश्यकता है।

 

डॉक्टर्स डे केवल शुभकामनाएँ देने का अवसर नहीं, बल्कि उन चिकित्सकों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन भी है जो हर दिन अनगिनत लोगों का जीवन बचाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं।

 

आइए, इस डॉक्टर्स डे पर संकल्प लें कि डॉक्टरों का इंसान समझेंगे उनका भी दूसरे ही इंसानों की तरह सम्मान करेंगे, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में सकारात्मक सहयोग देंगे और यह याद रखेंगे—

 

“डॉक्टर भगवान नहीं, इंसान हैं। लेकिन वे इंसानियत की सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हैं।”

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