



शिमला:- प्रदेश हाई कोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई घरेलू विभाजन नए सिरे से कानूनी अधिकार तय करता है तो उसका पंजीकृत होना अनिवार्य है।

बिना पंजीकरण ऐसे समझौतों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब तक साझी जमीन का बंटवारा कानूनी रूप से अंतिम नहीं हो जाता तब तक कोई भी पक्ष उसके सबसे बेहतरीन हिस्से पर जबरन कब्जा या निर्माण नहीं कर सकता।



यह फैसला न्यायाधीश राकेश कैंथला की एकलपीठ ने प्रेम कुमार बनाम प्रकाश चंद शर्मा मामले में प्रतिवादियों की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए सुनाया।






पंजीकरण जरूरी


हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई दस्तावेज पुराने बंटवारे की केवल जानकारी देने के बजाय नए सिरे से मालिकाना हक तय करता है।



तो पंजीकरण अधिनियम की धारा 17(1)(b) के तहत उसका पंजीकरण जरूरी है। इस मामले में 1978 का समझौता अपंजीकृत था, इसलिए उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है।


गवाहों के बयान में क्या आया सामने
गवाहों के बयानों से सामने आया कि प्रतिवादी के पास 12 बिस्वा से अधिक जमीन थी, जबकि वादी के पास केवल पांच बिस्वा जमीन थी। इसके अलावा बंटवारे का मामला अभी भी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के पास अपील में लंबित था।
कानूनी रूप से बंटवारे तक जमीन साझा
कोर्ट ने कहा कि जब कब्जा असमान हो और मामला लंबित हो तो यह साबित होता है कि पक्षकारों ने कभी उस समझौते को पूरी तरह स्वीकार ही नहीं किया था।

कोर्ट ने दोहराया कि जब तक कानूनी रूप से अंतिम बंटवारा नहीं हो जाता तब तक जमीन को सांझा ही माना जाएगा और किसी भी पक्ष को सबसे कीमती हिस्से को हड़पने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

















