एसएफआई ने कुलपति को सौंपे ज्ञापन में छात्र मांगों

शिमला/विवेकानंद वशिष्ठ :-  एसएफआई हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने कुलपति को सौंपे ज्ञापन में छात्र मांगों, फीस वृद्धि और भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग उठाई

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने विश्वविद्यालय के कुलपति को ज्ञापन सौंपते हुए विश्वविद्यालय परिसर में छात्र लोकतंत्र की बहाली, फीस वृद्धि की वापसी, शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक शुल्कों में पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र न्यायिक जांच, चयनित अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों के सत्यापन, यूजीसी रेगुलेशन 2018 के पालन, ईडब्ल्यूएस/ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता, जिम्मेदारी तय करने और कैग टिप्पणियों पर कार्रवाई जैसे गंभीर मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

 

एसएफआई ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्रदेश के हजारों विद्यार्थियों, विशेषकर ग्रामीण, जनजातीय, किसान, मजदूर, निम्न-मध्यवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्थान है। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में छात्र हित, सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

 

–छात्र केंद्रीय संघ चुनाव बहाल करने की मांग
एसएफआई ने ज्ञापन में विश्वविद्यालय प्रशासन से छात्र केंद्रीय संघ चुनावों को तत्काल बहाल करने की मांग की। संगठन ने कहा कि छात्र केंद्रीय संघ विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है।

 

छात्र समस्याओं, शैक्षणिक मुद्दों, छात्रावास, परिवहन, पुस्तकालय, परीक्षा, फीस, परिणाम और परिसर की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े प्रश्नों को संगठित ढंग से उठाने के लिए चुना हुआ छात्र प्रतिनिधित्व आवश्यक है।

 

एसएफआई ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई इन सिफारिशों का उद्देश्य छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक, पारदर्शी, शांतिपूर्ण और जवाबदेह बनाना था।

 

लिंगदोह कमेटी ने छात्र संघ चुनावों को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उन्हें नियमानुसार और पारदर्शी तरीके से करवाने की व्यवस्था सुझाई थी। इसलिए छात्र संघ चुनावों पर रोक लगाना लिंगदोह कमेटी की मूल भावना के विपरीत है।

 

संगठन ने कहा कि छात्र संघ चुनावों के बंद होने से विश्वविद्यालय में छात्रों की संस्थागत आवाज कमजोर हुई है।

 

प्रशासनिक फैसलों में छात्रों की भागीदारी घटने से फीस वृद्धि, परीक्षा संबंधी अव्यवस्था, छात्रावास समस्याएं, परिवहन कठिनाइयां और अन्य शैक्षणिक मुद्दे लगातार बढ़े हैं। लोकतांत्रिक परिसर व्यवस्था के लिए एससीए चुनावों की बहाली अत्यंत आवश्यक है।

 

–25 प्रतिशत फीस वृद्धि वापस लेने की मांग
एसएफआई ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा फीस, विश्वविद्यालय बस किराया, थीसिस जमा शुल्क और अन्य छात्र संबंधी शुल्कों में की गई वृद्धि को छात्र विरोधी निर्णय बताया। संगठन ने कहा कि प्रशासन द्वारा वृद्धि को 25 प्रतिशत तक सीमित बताया जा रहा है, लेकिन जिन मदों में शुल्क बढ़ाया गया है, उनका संयुक्त प्रभाव विद्यार्थियों पर कहीं अधिक आर्थिक बोझ डालता है।
संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा ग्रामीण, जनजातीय, किसान, मजदूर, बागवान, दिहाड़ीदार, निम्न-मध्यवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आता है।

 

ऐसे परिवारों के लिए फीस, परीक्षा शुल्क, परिवहन शुल्क, छात्रावास व्यय, शोध कार्य, थीसिस जमा शुल्क और अन्य शुल्कों में बार-बार वृद्धि उच्च शिक्षा को कठिन बनाती है। सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का उद्देश्य शिक्षा को सुलभ, समावेशी और किफायती बनाना है, न कि शिक्षा को बाजार आधारित सेवा में बदलना।

 

एसएफआई ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के नाम पर उच्च शिक्षा में व्यावसायीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया तेज हो रही है। सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि इसी दिशा का हिस्सा है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार संकुचित होते हैं। संगठन ने मांग की कि विश्वविद्यालय प्रशासन तत्काल फीस वृद्धि वापस ले और भविष्य में किसी भी शुल्क वृद्धि से पहले छात्र संगठनों, शिक्षक समुदाय और अन्य हितधारकों से लोकतांत्रिक परामर्श करे।

भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र न्यायिक जांच

एसएफआई ने विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य और एसोसिएट प्रोफेसर पदों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की। ज्ञापन में Advertisement No. Rectt.-17/2019 dated 30.12.2019 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, पात्रता, प्रमाणपत्र सत्यापन, अंक आवंटन और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

 

संगठन ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक विश्वविद्यालय में नियुक्तियां केवल योग्यता, नियमों, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होनी चाहिए। यदि भर्ती प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न होता है, तो यह न केवल चयन प्रक्रिया बल्कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

 

इसलिए मामले की जांच किसी विभागीय स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक जांच करवाई जानी चाहिए।

 

–चयनित अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन
एसएफआई ने मांग की कि चयनित अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत सभी प्रमाणपत्रों का विस्तृत और निष्पक्ष सत्यापन कराया जाए। इसमें शैक्षणिक योग्यता, नेट/पीएचडी से संबंधित दस्तावेज, अनुभव प्रमाणपत्र, शोध प्रकाशन, श्रेणी प्रमाणपत्र, आवेदन के समय जमा किए गए दस्तावेज और अन्य संबंधित अभिलेख शामिल होने चाहिए।

 

संगठन ने कहा कि प्रमाणपत्र सत्यापन किसी भी भर्ती प्रक्रिया की आधारभूत शर्त है। यदि प्रमाणपत्रों की तिथि, वैधता, जारी करने वाली संस्था, अनुभव अवधि या दस्तावेजों की प्रामाणिकता में कोई अंतर पाया जाता है, तो चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चयन से पूर्व और चयन के बाद दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर, किस अधिकारी द्वारा और किन मानकों के आधार पर की गई।

 

यूजीसी रेगुलेशन 2018 के पालन की जांच

एसएफआई ने मांग की कि सभी चयनित अभ्यर्थियों की पात्रता यूजीसी रेगुलेशन 2018 के अनुसार पुनः जांची जाए। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति के लिए यूजीसी द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता, नेट/पीएचडी की शर्तें, शोध अनुभव, शिक्षण अनुभव, प्रकाशन की गुणवत्ता और अन्य अकादमिक मानक अनिवार्य होते हैं।

 

ज्ञापन में कहा गया कि यदि किसी अभ्यर्थी की पात्रता यूजीसी रेगुलेशन 2018 के अनुरूप नहीं है, तो ऐसी नियुक्ति विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता और विधिक वैधता दोनों के लिए गंभीर विषय है। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चयनित अभ्यर्थियों की पात्रता, अनुभव और अंक आवंटन को यूजीसी मानकों के संदर्भ में पुनः परखा जाए।

 

–अनुभव अंकों की गणना और शोध प्रकाशनों की जांच
एसएफआई ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में शिक्षण एवं शोध अनुभव के लिए दिए गए अंकों की गणना पारदर्शी और नियमसम्मत होनी चाहिए। संगठन ने मांग की कि अनुभव प्रमाणपत्रों में उल्लिखित अवधि, कार्यस्थल, पदनाम, कार्य की प्रकृति, पूर्णकालिक या अंशकालिक स्थिति और संबंधित संस्थान की मान्यता की जांच की जाए।

 

संगठन ने शोध प्रकाशनों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि प्रकाशनों की वैधता, प्रकाशक की विश्वसनीयता, जर्नल की मान्यता, यूजीसी केयर सूची या संबंधित मानकों के अनुरूपता तथा प्रकाशन तिथि की जांच आवश्यक है।

 

केवल संख्या के आधार पर शोध की गुणवत्ता का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिष्ठा के लिए शोध प्रकाशनों की गंभीर जांच आवश्यक है।

–ईडब्ल्यूएस और ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता
एसएफआई ने मांग की कि चयनित अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत ईडब्ल्यूएस और ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता, जारी करने की तिथि और आवेदन की अंतिम तिथि के संदर्भ में उनकी स्थिति की जांच की जाए।

 

संगठन ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय का संवैधानिक साधन है और इसकी विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब श्रेणी प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध, समयबद्ध और नियमों के अनुरूप हों।

 

एसएफआई ने कहा कि यदि कोई प्रमाणपत्र आवेदन की अंतिम तिथि के बाद जारी हुआ है, यदि वह निर्धारित प्रारूप में नहीं है, या यदि उसकी वैधता संबंधित अवधि में लागू नहीं थी, तो ऐसे मामलों की जांच अनिवार्य है। ईडब्ल्यूएस और ओबीसी श्रेणी से जुड़ी नियुक्तियों में प्रमाणपत्रों की जांच विशेष सावधानी से होनी चाहिए ताकि आरक्षण व्यवस्था का लाभ वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों तक ही पहुंचे।

चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग

एसएफआई ने चयन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन को शॉर्टलिस्टिंग मानदंड, स्क्रीनिंग प्रक्रिया, अकादमिक अंकों का विभाजन, अनुभव अंकों की गणना, शोध प्रकाशनों के मूल्यांकन, साक्षात्कार अंकों और चयन के अंतिम आधार को सार्वजनिक करना चाहिए।

 

संगठन ने कहा कि पारदर्शिता किसी भी सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त है। यदि चयन प्रक्रिया से संबंधित जानकारी अस्पष्ट रहती है, तो संदेह और अविश्वास उत्पन्न होता है। विश्वविद्यालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन नियमों के आधार पर अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट किया गया, किन दस्तावेजों को मान्य माना गया, किस आधार पर अंक दिए गए और चयन समिति द्वारा अंतिम निर्णय किन मानकों पर लिया गया।

जवाबदेही तय करने की मांग

एसएफआई ने कहा कि यदि भर्ती प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन, प्रक्रियागत अनियमितता, दस्तावेजों की अनदेखी, गलत अंक आवंटन, प्रमाणपत्र सत्यापन में लापरवाही या किसी भी प्रकार का कदाचार सिद्ध होता है, तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

 

संगठन ने कहा कि जांच केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। जांच का उद्देश्य तथ्यों को सामने लाना, दोषियों की पहचान करना, नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल करना और भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकना होना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना पारदर्शिता और निष्पक्षता की स्थापना संभव नहीं है।

 

कैग टिप्पणियों पर कार्रवाई की मांग

एसएफआई ने कैग रिपोर्ट में विश्वविद्यालय से संबंधित टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़ी टिप्पणियां अत्यंत गंभीर हैं। संगठन ने मांग की कि विश्वविद्यालय प्रशासन स्पष्ट करे कि कैग द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

एसएफआई ने कहा कि सार्वजनिक धन से चलने वाले विश्वविद्यालय में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शी खर्च, नियमित ऑडिट, जवाबदेह प्रशासन और नियमसम्मत निर्णय प्रक्रिया अनिवार्य है। यदि कैग ने किसी प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन या प्रशासनिक निर्णय पर आपत्ति दर्ज की है, तो विश्वविद्यालय को उस पर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।

 

स्वतंत्र न्यायिक जांच की आवश्यकता

एसएफआई ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया और प्रमाणपत्रों से जुड़े आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विभागीय जांच पर्याप्त नहीं होगी। निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक जांच करवाई जानी चाहिए।

 

संगठन ने मांग की कि जांच के दायरे में नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े सभी रिकॉर्ड, आवेदन पत्र, प्रमाणपत्र, अनुभव दस्तावेज, शोध प्रकाशन, शॉर्टलिस्टिंग मानदंड, स्क्रीनिंग रिपोर्ट, चयन समिति की कार्यवाही, अंक आवंटन और अंतिम चयन सूची को शामिल किया जाए।

 

जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि विश्वविद्यालय समुदाय और आम जनता के समक्ष तथ्य स्पष्ट हो सकें।

10 बजे से 5 बजे तक की समय-सारिणी वापस लेने की मांग

एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लागू 10 बजे से 5 बजे तक की समय-सारिणी को छात्र हितों के विपरीत बताया। संगठन ने कहा कि पहाड़ी प्रदेश में दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों को परिवहन, छात्रावास, पुस्तकालय, विभागीय कार्य, रोजगार संबंधी दायित्वों और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

 

संगठन ने कहा कि इस तरह के निर्णय लागू करने से पहले छात्र समुदाय और विभागों से व्यापक संवाद आवश्यक है। प्रशासन को पूर्व समय-सारिणी बहाल करनी चाहिए और किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले छात्रों की वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन करना चाहिए।

 

एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की, कि छात्र हित, सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए इन मांगों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। संगठन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को जनपक्षीय, लोकतांत्रिक, पारदर्शी और समावेशी सार्वजनिक शिक्षण संस्थान के रूप में मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

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