एक डॉक्टर होने के नाते और सभी चिकित्सक साथियों की ओर से विनम्र लेकिन स्पष्ट प्रतिक्रिया

हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ:-  चिकित्सा शिक्षा भारत में हो या विदेश में, उसका मूल उद्देश्य एक ही है—मानव जीवन की रक्षा और मरीज की सेवा। विदेश से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉक्टरों को भारत में सेवा देने से पहले निर्धारित मानकों और आवश्यक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसलिए बिना पूरी जानकारी के किसी चिकित्सक की योग्यता या क्षमता पर टिप्पणी करना उचित नहीं है।

 

ज्ञान का सम्मान तभी सार्थक है, जब शब्दों में भी मर्यादा हो। किसी भी डॉक्टर को उसकी शिक्षा की जगह के आधार पर कमतर आंकना न तो चिकित्सा पेशे की गरिमा के अनुरूप है और न ही एक स्वस्थ समाज की सोच के।

 

और यदि किसी टिप्पणी से देश-विदेश से पढ़कर आज देश की सेवा कर रहे चिकित्सकों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करना ही एक गरिमापूर्ण कदम होगा।

 

सवाल इतना ही है—जब गंभीर बीमारी का सामना स्वयं या अपने परिवार से होता है, तो इलाज के लिए विदेशों और बड़े निजी अस्पतालों की विशेषज्ञ सेवाओं का सहारा क्यों लिया जाता है?

 

डॉक्टर की पहचान उसकी डिग्री के देश से नहीं, उसके ज्ञान, कौशल, ईमानदारी और मरीज के प्रति सेवा-भाव से होती है।

 

आलोचना तथ्यपरक होनी चाहिए, अपमानजनक नहीं।

विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन चिकित्सकों के सम्मान से समझौता नहीं।

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