



शिमला/विवेकानंद वशिष्ठ:- धोखाधार के नाम से प्रसिद्ध मंडी जिले में देवताओं और डाइनो में होगा महासंग्राम। कला युगधार को लोक उत्सव दुगोश या झामरकीं की रात में डैनी (डाकिनियों) के भीन छिड़के बालों महारानेमण के नदी के पर देव समाज की नजरें गड़ी हुई हैं।
“विश्वास नहीं होता” क्या वाकई में तंत्र जानने वाली महिलाएं डगवांस पर उड़कर पहुंचती हैं: धोखाधार

डेंकन चतुर्दशी को अयोग्य चतुर्दशी भी कहा गया है, माना जाता है कि इस रात तांत्रिक शक्तियां अधिक प्रभावी रहती हैं। हालांकि से जुड़ी जनश्रुतियों में सबसे दिलचस्प किस्सा डगवांस को रात जादू टोना जानने वाली महिलाओं का शाडु, चील या हुल की मांगं पर सवार होकर आकाश मार्ग से सौहाधार पहुंचने से जुड़ा है।
आधुनिक दौर में ये किस्से लगते हैं कपोल कल्पित

आधुनिक युग में इस तरह की बातों को कपोल-कल्पित और अंधविश्वास भी माना जाएगा, लेकिन इससे जुड़े लोक विश्वास का ही यह परिणाम है कि नाकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा के लिए पहाड़ के लोग डंगवांस पर उपाय करते आए हैं।
डगवांस का रहस्य: चाँदनी रात में झाड़ू पर उड़कर धोखाधार क्यों जाती हैं महिलाएं?

कल डजावासे पर तांत्रिकों की कटीती साधु के साथ ही नीबू के साथ अर्पित किया करती के रातों को घर के मुख्य दरवाजे के सोर्प पर रग्गांत्य जाएगा। वहीं पल्धार तैयार कर इसका एक भाग घरों की छतों पर फैकने का भी नियम है, ताकि नकारात्मक शक्तियां इसे ग्रहण करते हुए शांत रहें।
आधुनिक युग में भी जिंदा है डगवांस का खौफ! अंधविश्वास या पहाड़ की सच्चाई?

यहीं जनपद के फांगण और आसपास इलाके में तो यह नियम आज भी व्यवहार में है कि यदि नवजात शिशु, भाई या बहन को को अत्तदा का नहीं हुआ है तो फिर उसे पूरे माहस्त मास में गोडूली बेला के पश्वात घर से बाहर, आँगन तक में भी नहीं निकाला जाता है, इसके पीछे नवजात को नकारात्मक शक्तियों की छाया से बचाना है।
डगवांस पर तांत्रिक शक्तियां प्रभावी रहती हैं। वहीं नकारात्मक ऊर्जा की छाया से बचने के लिए, पहाड़ के लोग आज भी डगवांस पर सुरक्षात्मक उपाय करते आए हैं। उन्होंने डुग्थांगों से तंत्र ज्ञानने वाली महिलाएं साडू, या हुल की मांग पर सवार हो, डर्बुस्कर धोखधार जाती हैं।
मुख्य बातें और परंपराएँ:- मुख्य दरवाजे पर सुरक्षा: रात के समय घर के मुख्य दरवाजे (चौखट) पर कुछ विशेष चीज़ें या रक्षक सामग्री रखी या लगाई जाती है।छत पर भोग फेंकना: अनाज या भोजन (पल्धार) तैयार करके उसका एक हिस्सा घर की छत पर फेंका जाता है।
माना जाता है कि ऐसा करने से नकारात्मक शक्तियाँ (बुरी आत्माएँ) उस भोग को ग्रहण करके शांत हो जाती हैं और घर के भीतर नुकसान नहीं पहुँचातीं।नवजात शिशुओं की सुरक्षा:
फांगण और आसपास के इलाकों में यह नियम आज भी माना जाता है कि यदि कोई नवजात शिशु, भाई या बहन अभी एक निश्चित उम्र या अवधि (जैसे कुछ महीने) का नहीं हुआ है, तो उसे पूरे ‘भाद्रपद’ (भादो) या ‘आश्विन’ मास में गोधूलि बेला (शाम के समय) के बाद घर से बाहर, यहाँ तक कि आँगन में भी नहीं निकाला जाता।
इसका उद्देश्य नवजात को बुरी शक्तियों की छाया से बचाना है।तांत्रिक शक्तियों का प्रभाव: लोक साहित्यकार डॉ. जगदीश शर्मा के अनुसार, ‘डगवांस’ के समय तांत्रिक शक्तियां बहुत प्रभावी रहती हैं।
नकारात्मक ऊर्जा से बचने के लिए पहाड़ के लोग सदियों से सुरक्षात्मक उपाय करते आ रहे हैं।
पारंपरिक मान्यता: ऐसी लोककथाएँ हैं कि तंत्र-मंत्र जानने वाली महिलाएँ इस दौरान साडू या हुल (पारंपरिक लोक मान्यताओं के जीव/पक्षी) की सवारी करके डांडा-कांडा (ऊंचे पहाड़ों और धारों) पर तांत्रिक क्रियाओं के लिए जाती हैं।






























