



उत्तराखंड/विवेकानंद वशिष्ठ:- उत्तराखंड की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात / बदियाजात यात्रा से जुड़ी है, जिसमें चार सींगों वाला पवित्र चौसिंगा खाडू (विशेष भेड़) मां नंदा की विदाई के बाद कैलाश (होमकुंड) की ओर आगे बढ़ रहा है। इसे एक दिव्य दूत माना जाता है जो भक्तों की प्रार्थनाएं और श्रृंगार सामग्री लेकर बर्फीले पहाड़ों की ओर अकेला प्रस्थान करता है।

नम आंखों से विदा हुआ माँ का दूत, सदियों पुरानी परंपरा फिर हुई जीवंत




उत्तराखंड के चमोली जिले में नंदा देवी बड़ी जात यात्रा का आयोजन संपन्न हुआ है। यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड (पंचगंगा) में विशेष पूजा-अर्चना के बाद भक्तों और देवी के आभूषणों की अगुवाई करने वाले चौसिंग्या खाडू को नम आंखों से कैलाश की ओर अकेले विदा किया गया।







यह परंपरा सदियों से गढ़वाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।



पौराणिक इतिहास और धार्मिक महत्व मां नंदा का देवदूत और रश: गढ़वाल और कुमाऊं की लोक संस्कृति में चौसिंग्या खाडू को कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि मां नंदा देवी का देवदूत और उनका वाहन माना जाता है।



12 साल में एक बार जन्म लेता है ये चमत्कारी मेढ़ा



धार्मिक मान्यता है कि यह अनोखा चार सींगों वाला मेढ़ा प्रत्येक 12 वर्ष में केवल नंदा देवी के मायके वाले क्षेत्र (चांदपुर गढ़ी या नौटी के आसपास) में ही रहस्यमयी ढंग से जन्म लेता है।श्रृंगार सामग्री की जिम्मेदारी: पूरी यात्रा के दौरान यह खाडू भक्तों के आगे-आगे मार्गदर्शक बनकर चलता है।
जब तक चौसिंगा चलता है, तब तक माँ नंदा अपने मायके से ससुराल की ओर चलती हैं।” – लोक श्रुति
इसकी पीठ पर सजे विशेष थैलों में मां नंदा के आभूषण, श्रृंगार सामग्री और भक्तों द्वारा दी गई भेंट (कलेऊ) रखी जाती है।
होमकुंड में 280 KM की महायात्रा संपन्न, आभूषण लेकर हिमालय में विलीन हुआ दिव्य खाडू

कैलाश की ओर विदाई का रहस्य: यात्रा जब अपने अंतिम बिंदु होमकुंड (लगभग 280 किमी की कठिन पैदल यात्रा के बाद) पहुंचती है, तो वहां खाडू की पीठ से सामग्री उतार ली जाती है।
इसके बाद इसे अक्षत-तिलक लगाकर विदा किया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसके बाद यह मेढ़ा इंसानी आबादी को छोड़कर निर्जन बर्फीले पहाड़ों को पार करता हुआ सीधे भगवान शिव के धाम कैलाश की ओर चला जाता है।
ये अलौकिक दृश्य उत्तराखंड के चमोली जिले में विश्व प्रसिद्ध *नंदा देवी राजजात (बड़ी जात)* यात्रा के अंतिम पड़ाव *होमकुंड (पंचगंगा)* का है, जहां हजारों भक्तों की मौजूदगी में ये विदाई हुई।
(विदाई का मंजर)
● 12 वर्ष बाद आयोजित इस महायात्रा के समापन पर विशेष पूजा के बाद चौसिंगा खाडू को तिलक-अक्षत लगाकर कैलाश की ओर विदा किया गया।
● इस दौरान पूरी घाटी “जय माँ नंदा” के जयकारों से गूंज उठी और कई भक्तों की आंखें नम हो गईं।
● खाडू की पीठ से माँ के आभूषण और श्रृंगार सामग्री उतारने के बाद, वो निर्जन बर्फीले पहाड़ों की ओर अकेला चल पड़ा।
*🔱 पौराणिक इतिहास – कौन है ये दूत?*
● गढ़वाल-कुमाऊं की लोक मान्यता में ये कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि *माँ नंदा देवी का देवदूत और वाहन* है।
● मान्यता है कि ये *चार सींगों वाला चमत्कारी मेढ़ा हर 12 साल में सिर्फ माँ के मायके (नौटी/चांदपुर गढ़ी)* में ही रहस्यमयी ढंग से जन्म लेता है।
● इसकी पीठ पर लदे थैलों में माँ के आभूषण, श्रृंगार और भक्तों की प्रार्थनाओं वाले कलेऊ रखे जाते हैं, जिसका ये पूरी यात्रा में मार्गदर्शक बनकर नेतृत्व करता है।
कैलाश का रहस्य
● धार्मिक मान्यता है कि होमकुंड के बाद ये खाडू मानव बस्ती छोड़कर सीधे *भगवान शिव के धाम कैलाश* की ओर चला जाता है और फिर कभी लौटकर नहीं आता।
● सदियों से ये यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक एकता और आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।
● स्थानीय लोग मानते हैं, खाडू का सकुशल कैलाश की ओर जाना यात्रा की सफलता और आने वाले 12 सालों तक सुख-समृद्धि का संकेत है।











