



शिमला/विवेकानंद वशिष्ठ:- हिमाचल प्रदेश की नगर परिषद राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को जनता ने जीत तो दिला दी, लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव से पहले हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने पूरी तस्वीर बदलकर रख दी। भाजपा के जीत के जश्न के बीच कांग्रेस ने ऐसी चाल चली कि कई जगह सत्ता का समीकरण उसके पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है।

भाजपा के हाथ से फिसली जोगेंद्रनगर की बाजी




जोगेंद्रनगर नगर परिषद में सात वार्डों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों की जीत के बाद पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थी। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद शुरू हुई राजनीतिक हलचल ने भाजपा की रणनीति पर पानी फेर दिया।






सूत्रों के अनुसार भाजपा समर्थित दो महिला पार्षद कांग्रेस के साथ आ गईं, जबकि कुछ निर्दलीय सदस्यों ने भी कांग्रेस को समर्थन दे दिया। इन घटनाक्रमों के बाद नगर परिषद में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो गई और सत्ता की बाजी उसके पक्ष में झुकती नजर आने लगी।


कुल्लू में भी बदले समीकरण, कांग्रेस को मिला फायदा



कुल्लू नगर परिषद में भी लगभग ऐसा ही राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया। 11 सदस्यीय परिषद में भाजपा और कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों की संख्या लगभग बराबर रही, जबकि निर्दलीय सदस्य निर्णायक भूमिका में थे।


शुरुआत में भाजपा अपनी स्थिति मजबूत मान रही थी, लेकिन बाद में कुछ निर्वाचित सदस्यों के रुख बदलने से पूरा समीकरण कांग्रेस के पक्ष में झुक गया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा संभावित राजनीतिक बदलावों का सही आकलन करने में चूक गई, जिसका उसे नुकसान उठाना पड़ा।
अब सरकाघाट पर टिकी सबकी नजरें
नगर परिषदों में जारी इस राजनीतिक उठापटक के बीच अब सबकी नजरें सरकाघाट नगर परिषद पर टिक गई हैं। यहां भी भाजपा और कांग्रेस समर्थित सदस्य बराबरी की स्थिति में हैं और अध्यक्ष पद का फैसला समर्थन जुटाने की रणनीति पर निर्भर करेगा।
दोनों दल पर्दे के पीछे सक्रिय हैं और अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सरकाघाट अगला राजनीतिक रणक्षेत्र बन सकता है।

भाजपा ने लगाए आरोप, कांग्रेस ने बताया रणनीति की जीत
इन घटनाक्रमों के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर दबाव की राजनीति और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं। वहीं कांग्रेस इसे अपनी मजबूत राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक क्षमता का परिणाम बता रही है।
नगर परिषदों में बदलते राजनीतिक समीकरणों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि चुनाव जीतना ही सब कुछ नहीं होता, असली लड़ाई नतीजों के बाद सत्ता के गणित को साधने की होती है।

















