



हमीरपुर/विवेकानंद वशिष्ठ:- हमीरपुर के प्रसिद्ध लेखक डॉ संदीप शर्मा की नई अंग्रेजी में अनुवादित कहानियों की पुस्तक द कॉल ऑफ सॉइल का विमोचन एनवायरनमेंट एंड सोशल डेवलपमेंट एसोसिएशन दिल्ली द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित सातवें वर्ल्ड एनवायरमेंट समिट 2026 में रामाडा होटल, कोलंबो, श्रीलंका में दिनांक 23 अक्टूबर 2026 को भव्य तरीके से हुआ।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो. बलराम पाणि डीन ऑफ कॉलेजिज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (भारत), विशेष सम्मानित अतिथि डॉ. हमीदा खानुम सुपरन्यूमेरेरी प्रोफेसर, प्राणी विज्ञान विभाग, ढाका विश्वविद्यालय, बांग्लादेश एवं अध्यक्ष, जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ बांग्लादेश, विशेष सम्मानित अतिथि प्रो. (डॉ.) दमिथ गंगोडाविलेज सीईओ, यूरेशिया नेशंस कैंपस, श्रीलंका, डॉ. लोकेश सिंह प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, विला कॉलेज, मालदीव, प्रो. पामेला सिंगला पूर्व विभागाध्यक्ष, सामाजिक कार्य विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रो. सदा नंद प्रसाद प्राचार्य, डॉ. भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रो. एस. पी. सिंह एमेरिटस फेलो (मानद शोध अध्येता) मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग आईआईटी रुड़की, उत्तराखंड, भारत डॉ. जितेंद्र के. नागर, महासचिव, पर्यावरण एवं सामाजिक विकास संघ, एवं सहायक प्रोफेसर, डॉ. भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय शामिल रहे।




डॉ संदीप शर्मा द्वारा लिखित इस पुस्तक में 21 कहानियां शामिल की गई हैं। डॉ संदीप शर्मा ने बताया कि द कॉल ऑफ सॉइल पुस्तक का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त करना, जीवन के विविध रंगों को चित्रित करना तथा मानवीय भावनाओं और इच्छाओं की गहराई को सामने लाना है।







कहानियों में वे पात्र, जो अपनी जड़ों से बहुत दूर भटक गए हैं, अंततः अपनी उसी मिट्टी और अपने उसी आकाश की ओर लौटना चाहते हैं, जिससे उनका अस्तित्व जुड़ा हुआ है। कोई सपने बाँट रहा है और हम उन सपनों में खोकर अपनी रातें गुज़ार रहे हैं।




हमारी धरती पर निरंतर बढ़ता अतिक्रमण और तीव्र औद्योगिकीकरण बाजार की शक्तियों के साथ एक संघर्ष को जन्म दे रहा है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होती जा रही है।






परंपरागत कार्यों और आजीविका के साधनों के पतन के साथ समाज में शोषण की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। हिमाचल की विशिष्ट पहाड़ी भाषा, जीवन-पद्धति, संस्कृति और क्षेत्रीय लोक-सुगंध धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।



पुस्तक में प्राचीन सभ्यता और आधुनिक समय के बीच का द्वंद्व स्पष्ट दिखाई देता है। एक ओर विकास और आधुनिकता की चमक है, तो दूसरी ओर अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की चिंता।
समानता और न्याय पर आधारित समाज के निर्माण की आकांक्षा के बावजूद आर्थिक और सामाजिक असमानता लगातार बढ़ रही है। यही अंतर्विरोध कहानियों को मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना और अपनी मिट्टी से जुड़ाव का स्वर प्रदान करता है।





