नम आंखों से विदा हुआ माँ का दूत, सदियों पुरानी परंपरा फिर हुई जीवंत

उत्तराखंड/विवेकानंद वशिष्ठ:-  हिमालय के उत्तुंग शिखरों पर जब 280 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक ‘नन्दा राजजात’ की पदचाप शांत हो जाती है, तब भी त्रिशूल और नन्दा घुंघटी की बर्फीली हवाओं में एक मर्मस्पर्शी सन्नाटा तैरता रहता है।

कैलाश की ओर अकेला चला, माँ नंदा का चौसिंगा दूत

शंखों की गूँज, ढोल-दमाऊँ की थाप और लाखों श्रद्धालुओं का रेला जब नीचे घाटियों की ओर लौट आता है, तब 16,000 फीट की विकट ऊँचाई पर स्थित ‘होमकुंड’ के हिमखंडों में केवल एक अनुत्तरित रहस्य शेष रह जाता है—वह चार सींगों वाला मूक जीव कहाँ समा गया? वह पशु कौन था, जिसके नेत्रों से विदाई के अंतिम क्षणों में मनुष्यों की तरह गर्म अश्रुधारा बह निकली थी?

होमकुंड के सन्नाटे में गूँजती वो मूक विदाई: 280 किमी के हिम-पथ पर जब आँसुओं में विलीन हो गया चार सींगों वाला देवदूत!

राजजात केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि देवभूमि की आत्मा का वह आध्यात्मिक महा-अनुष्ठान है, जहाँ वेद-पुराणों की आद्यशक्ति पहाड़ के आँगन में मायके की लाडली बेटी बनकर सिसकती है।
वेदों की ऋचा से आँगन की ‘धियाण’ तक: कौन हैं नन्दा और सुनन्दा?
इस अलौकिक यात्रा के आध्यात्मिक रहस्य की जड़ें सनातन वांग्मय और वेदों की गहन ऋचाओं में समाई हैं।
ऋग्वेद के अमर ‘देवी सूक्त’ में जिस पराशक्ति का साक्षात्कार करते हुए महर्षि कहते हैं—“अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां…”—जो संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी, सृष्टि का मूल आधार और परब्रह्म की क्रियाशील चेतना है, वही परांबा इन हिमाच्छादित शिखरों पर आकर लोक की दुलारी ‘धियाण’ (विवाहिता बेटी) बन जाती है। मार्कण्डेय पुराण, श्रीमद्देवीभागवत और कालिका पुराण में महिषासुरमर्दिनी, उमा और योगमाया के जिस प्रचंड और करुणामयी स्वरूप की वंदना की गई है, उत्तराखंड का लोक-मानस उसी शक्ति को ‘नन्दा’ के रूप में अपने हृदय में संजोए हुए है। वह पर्वतराज हिमावंत और माता मैना की राजदुलारी हैं, जिनका पाणिग्रहण औघड़दानी देवाधिदेव महादेव के साथ कैलाश में हुआ।
और सुनन्दा? सुनन्दा उसी आदिपराशक्ति का अभिन्न, पोषणकारी और सौम्य विस्तार हैं।
शास्त्रों में प्रकृति के जिस द्वैत और एकाकार भाव का दर्शन मिलता है—एक संहार और तपोमय तेज (नन्दा/पार्वती), तो दूसरा वात्सल्य, समृद्धि और श्री का शीतल प्रवाह (सुनन्दा/लक्ष्मी)। कुमाऊँ के ऐतिहासिक चंद राजवंश के समय जब अल्मोड़ा के मल्ला महल में नन्दा के साथ सुनन्दा की युगल प्रतिमा की प्रतिष्ठा हुई, तो गढ़वाल और कुमाऊँ की सांस्कृतिक सीमाएँ एक ही आध्यात्मिक सूत्र में बंध गईं। नन्दा यदि हिमालय का दृढ़ आत्म-संकल्प हैं, तो सुनन्दा उसकी ममतामयी करुणा। इन दोनों के बिना हिमालय की शक्ति-साधना अपूर्ण है।
280 किलोमीटर का अश्रु-सिक्त महामार्ग: आस्था और वैराग्य की डगर
काँसुआ और नौटी से प्रारंभ होकर होमकुंड तक जाने वाला 280 किलोमीटर का यह विदाई-पथ संसार की सबसे कठिन आध्यात्मिक यात्राओं में गिना जाता है। यह मार्ग केवल पैरों से नहीं, बल्कि आंसुओं और अगाध भक्ति से नापा जाता है:
* नन्दकेसरी का पावन संगम: चाँदपुर गढ़ी, सेम, कोटी और कुलसारी के ग्राम्य अंचलों से आशीष समेटती हुई यात्रा जब नन्दकेसरी पहुँचती है, तो यहाँ कुमाऊँ की नन्दा-टोलियाँ गढ़वाल की छंतोलियों से गले मिलती हैं। यह केवल दो भूभागों का नहीं, बल्कि दो बिछुड़ी हुई बहनों के आँसुओं का संगम होता है।
* वाण (Wan) — सभ्यता का अंतिम छोर: फल्दिया और मुन्दोली के वनों को चीरता हुआ कारवां जब वाण गाँव पहुँचता है, तो मानव बस्तियाँ पीछे छूट जाती हैं। यहाँ नन्दा के धर्मभाई लाटू देवता का वह रहस्यमयी धाम है, जहाँ आज भी मुख्य पुजारी अपनी आँखों और मुख पर पट्टी बाँधकर पूजा करते हैं, ताकि नागराज और भगवती के अलौकिक तेज के सम्मुख मानवीय दृष्टि भस्म न हो जाए। वाण के बाद केवल देव-भूमि और शून्य का विस्तार रह जाता है।
* वेदनी बुग्याल का तपोलोक: समुद्रतल से 12,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर मखमली घास के असीम मैदान ‘वेदनी बुग्याल’ में पहुँचकर मन स्वतः समाधिस्थ हो जाता है। मान्यता है कि इसी वैतरणी कुंड के पावन तट पर ऋषियों ने वेदों की ऋचाओं का साक्षात्कार किया था, जहाँ के शांत जल में त्रिशूल पर्वत का भव्य प्रतिबिंब साक्षात शिवलोक का आभास कराता है।
* पातर नचौणियाँ और कालू विनायक: आगे का मार्ग प्रकृति की कठोर चेतावनी है। पातर नचौणियाँ वह पथरीला वीराना है, जहाँ लोक-आख्यानों के अनुसार कन्नौज के राजा जसधवल ने नर्तकियों संग विलास का प्रयास किया था और भगवती के कोप से वे सभी पाषाण बन गईं। इसके बाद कालू विनायक पर स्थापित विनायक की श्याम शिला यात्रियों को धैर्य और आत्मसंयम की अंतिम दीक्षा देती है।
* रूपकुंड और ज्यूरांगुली का ‘मृत्यु-दर्रा’: 16,000 फीट पर स्थित भगवाबासा की प्राणघाती बर्फीली हवाओं के पार वह रहस्यमयी ‘रूपकुंड’ आता है, जिसके तल में सदियों पुराने नरकंकाल बिखरे पड़े हैं—मानो अहंकार के पतन की मूक गवाही दे रहे हों। इसके ठीक ऊपर 70 डिग्री की सीधी खड़ी चट्टान ‘ज्यूरांगुली’ दर्रा है, जहाँ एक असावधान कदम सीधे पाताल में ले जाता है। इसे लांघकर ‘शिला समुद्र’ के विशाल हिमकणों को पार करते हुए यात्रा अपने अंतिम मुकाम पर पहुँचती है—होमकुंड।
चौसिंगिया खाडू: चार सींगों वाला वो मूक देवदूत
इस संपूर्ण 280 किलोमीटर के बीहड़, विजन और प्राणलेवा मार्ग के केंद्र में जो सबसे बड़ा रहस्य चलता है, वह है—चौसिंगिया खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा)।
न उसके गले में कोई बंधन होता है, न उसे कोई चरवाहा हाँकता है। लाखों की उन्मादी भीड़, वेद-मंत्रों के सस्वर पाठ, रणसिंघों की भयंकर गूँज और शून्यांक से नीचे गिरते तापमान के बीच भी वह कभी डगमगाता नहीं। जैसे कोई अदृश्य ईश्वरीय शक्ति उसका सींग थामकर उसे ठीक उसी पगडंडी पर ले जा रही हो, जहाँ कभी स्वयं भगवान शिव चले थे।
पड़ाव-दर-पड़ाव जब पहाड़ की धियाणियाँ (महिलाएँ) रोती-बिलखती उसके सम्मुख आती हैं, तो वह चार सींगों वाला मूक जीव ठिठककर खड़ा हो जाता है। महिलाएँ उसके घुंघराले बालों पर काँपते हाथों से रोली-पिठ्यां का तिलक लगाती हैं, उसे अपना कलेवा अर्पित करती हैं और उसके कानों में झुककर सिसकते हुए कहती हैं:
“हे खाडू! कैलाश में मेरी नन्दा से कहना कि मायके वाले उसे भूले नहीं हैं… वहाँ उसे कोई कष्ट न होने देना… हमारे घर-आँगन का कुशल-क्षेम माँ के चरणों में रख देना।”
वह अपनी गहरी, गंभीर कत्थई आँखों को घुमाकर उन विलाप करती धियाणियों को ऐसे निहारता है, जैसे सदियों की मानवीय व्यथा को अपनी मूक देह में समेट रहा हो।
होमकुंड में महा-अंतर्धान: बर्फ के सन्नाटे में किसका दूत समा गया?
त्रिशूल पर्वत के चरणों में स्थित होमकुंड में जब अंतिम महायज्ञ की पूर्णाहुति होती है, तो समस्त प्रकृति एक अलौकिक सन्नाटे में डूब जाती है। यहाँ मानवीय कदमों की सीमा समाप्त हो जाती है। इसके आगे न कोई राजा जा सकता है, न कोई संत, न कोई पुजारी।
यज्ञ की भस्म और गंगाजल से उस चार सींग वाले खाडू का अंतिम अभिषेक किया जाता है। उसके चारों सींगों पर सिंदूर और स्वर्ण-पत्र मढ़े जाते हैं। उसकी पीठ पर नन्दा के मायके का भेजा सारा दहेज—रेशमी वस्त्र, स्वर्णाभूषण, कलेवा, सुगंधित धूप और रिंगाल की पवित्र छंतोली—कसकर बाँध दी जाती है।
और तभी वह कारुणिक दृश्य उपस्थित होता है, जिसे देखकर पत्थर का सीना भी फट पड़े।
चार सींगों वाला वह खाडू, जो अब तक अडिग खड़ा था, अचानक काँपने लगता है। उसकी दोनों आँखों के कोरों से गर्म अश्रुधारा बह निकलती है। पशु के कपोलों पर बहते हुए वे मानवीय आँसू साक्षात विदाई के रुदन होते हैं। वह मुड़कर एक बार समूची मानव-सृष्टि की ओर देखता है—मानो कह रहा हो कि उसने अपनी स्वामिनी का दायित्व पूर्ण किया।
इसके बाद, बिना किसी के धकेले, बिना पीछे मुड़े, वह चार सींगों वाला खाडू सीधी, दुर्गम हिम-दीवारों की ओर अकेला डग भरने लगता है।
सफेद कोहरा धीरे-धीरे नीचे उतरता है। बर्फ का एक बवंडर उठता है। लाखों आँखें एकटक उस श्वेत ढलान को निहारती रह जाती हैं। और कुछ ही पलों में, वह चार सींगों वाला रहस्यमयी दूत उन अनंत, अगाध हिम-शिखरों में सदा-सदा के लिए विलीन हो जाता है।
सैकड़ों वर्षों के इतिहास में न कभी उस खाडू की देह का कोई अवशेष मिला, न उसकी पीठ पर बँधे कलेवे का कोई तिनका कभी लौटकर नीचे आया। वह कहाँ समा गया? क्या वह नंदी का ही कोई दिव्य अवतार था जो शक्ति का भार उठाकर कैलाश लौट गया?
पीछे छूट जाता है केवल होमकुंड की भस्म में सुलगती पवित्र धूप की महक, त्रिशूल पर्वत की अनंत शांति, और समूचे उत्तराखंड के अंतर्मन में गूँजती लाखों कंठों की वही एक मार्मिक सिसकी—
“जै माँ नन्दा… फिर ऐए भोल… फिर ऐए मायके!”

[post-views]